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▫️ सौजन्य: श्री त्रिलोचन उप्रेती स्मृति 'हिमालयी शोध संस्थान’, पिथौरागढ़
हर एक देशभक्त भारतीय को यह ग्रंथ अवश्य पढना चाहिए...
भीष्म प्रकाशन का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ...

दैशिक शास्त्र - राष्ट्र की चिरंतन समृद्धि का रहस्य 

  • प्रेरक : लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक
  • प्रकटकर्ता : श्री १०८ सोमबारी जी महाराज
  • लेखक : बद्रीशाह ठुलघरिया
  • प्रस्तावना : भगवती प्रसाद ‘राघव’⁠
  • अभिमत : इंदुमती काटदरे
  • सरल रूप संपादक : सिद्धार्थ कौशिक
     

👉आज से 105 से भी अधिक वर्षों पूर्व, जब भारत स्वतंत्रता के मार्ग पर अग्रसर था, तब लोकमान्य बालगंगाधर ‘तिलक’ ने विचार किया “स्वतंत्रता के उपरान्त देश, समाज तथा देश के नागरिकों का मार्गदर्शन किस प्रकार हो? उनके स्वरूप, संचालन एवं वैचारिक दृष्टिकोण कैसे हों? उनके उद्देश्य क्या हों?” ‘तिलक’ का विश्वास था कि शिक्षा ही स्वराज्य की नींव है। उनका मत था कि अंग्रेज़ी शिक्षा पद्धति केवल क्लर्क तैयार करती है, राष्ट्रनिर्माता नहीं।
👉उनका मानना था कि केवल निवेदन और याचना से स्वतंत्रता नहीं मिलेगी—इसके लिए संघर्ष, बहिष्कार और प्रतिरोध आवश्यक है। लोकमान्य ‘तिलक’ के अनुसार स्वतंत्रता केवल सत्ता परिवर्तन नहीं है, यह आत्मा की मुक्ति है। मैकाले भूरी खाल में गोरी सोच डालने के प्रयास में सफल होता दिख रहा था।
👉ऐसे में आवश्यकता थी एक ऐसे विचार की, एक ऐसी सोच की, एक ऐसे ग्रंथ की जो जन-जन को प्राप्त हो, जो जन-जन का प्रत्येक स्थिति में मार्गदर्शन कर सके और जिससे परम शक्तिशाली समाज एवं व्यक्तित्वों का निर्माण हो सके। ऐसे विचारों के विक्षोभ में ‘तिलक’ जी ने अल्मोड़ा, उत्तराखंड में एक गुप्त दल तैयार किया जिसमें उन्होंने राष्ट्र पर अपने को न्यौछावर कर देने वाले, तात्कालिक समय की आधुनिक शिक्षा में शिक्षित, ऐसे क्रांतिकारियों को रखा जो भारतीय ज्ञान परंपरा के अनुयायी भी थे। ऐसे ही एक गुप्त दल का प्रतिनिधित्व कर रहे थे परम पूज्य श्री १०८ सोमबारी जी महाराज। लोकमान्य ‘तिलक’ ने उन्हें एक ऐसे शास्त्र को तैयार करने का दायित्व दिया, जो स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात व्यक्ति, समाज एवं राष्ट्र निर्माण का आधार बने। इस शास्त्र को नाम दिया गया “दैशिक शास्त्र”!

पृष्ठ संख्या : 296

दैशिक शास्त्र - राष्ट्र की चिरंतन समृद्धि का रहस्य

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